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प्रतिहार वंश की उत्पत्ति : भोज प्रतिहार की ग्वालियर प्रशस्ति : भाग .2

 भाग -१ से आगे .....भोज प्रतिहार की ग्वालियर प्रशस्ति : प्रतिहारों की उत्पत्ति के विषय में ग्वालियर में मिली हुई कन्नोज के प्रतिहार सम्रा भोज के समय की प्रशस्ति में लिखा है कि -

मन्विक्षा कुक्कुस्थ (त्स्थ) मूल
पृथवःक्ष्मापाल कल्पद्रुमाः॥2

तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रेषु घोरं,

राम: पौलस्त्य हिन्धं (हिस्रं) क्षतविहित समित्कर्म चक्रं पलाशेः।

श्लाघ्यस्तस्यानजो सौ मधवमदमषो मेघनादस्य संख्ये,

सौमित्रिस्तीव्रदंडः प्रतिहरण विर्धर्यः प्रतिहार आसीत् ॥3

तवूनशे प्रतिहार केतन भृति त्रैलोक्य रक्षा स्पदे

देवो नागभटः पुरातन मुने र्मूर्तिर्बमूवाभदुतम।

अर्थात्सूर्यवंश में मनु, इक्ष्वाकु, काकुस्थ आदि राजा हुए, उनके वंश में पौलस्त्य (रावण) को मारने वाले राम हुए, जिनका प्रतिहार उनका छोटा भा सौमित्र (लक्ष्मण) था, उसके वंश में नागभट्ट हुआ। आगे चलकर इसी प्रशस्ति । वत्सराज को इक्ष्वाकु वंश को उन्नत करने वाला कहा है। इसी प्रशस्ति के सात श्लोक में वत्सराज के लिये लिखा है कि उस क्षत्रिय पुगंव ने बलपूर्वक भडिकुल का साम्राज्य छीनकर इक्ष्वाकु कुल की उन्नति की।




कवि राजशेखर सम्राट भोज, महेन्द्रपाल और महीपाल के दरबार में कन्नोज था। वह महेन्द्रपाल का गुरु भी था। उसने विद्धशाल भंजिका नाटक में अपने शिष्य महेन्द्रपाल को रघुकुल तिलक लिखा है। बाल भारत में रघुग्रामणी लिखा और बालभारत नाटक महेन्द्रपाल के पुत्र महीपाल को रघुवंश मुक्तामणि लिखा है।

रघुकुल तिलको महेन्द्रपाल: (विद्धशाल भंजिका, 1/6)

देवा यस्य महेन्द्रपालनृपति: शिष्यो रघुग्रामणिः (बालभारत, 1/11)

तेन (महीपालदेवेन) च रघुवंश मुक्तामणिना (बालभारत)

चाटसू का बालादित्य गुहिल का वि. सं. 870 ईस्वी 813 का प्राप्त लेख है इस अभिलेख में गुहिल वंश और उसके शासकों के वर्णनों में सुमन्त्र भट्ट की युद्ध वीरता पराक्रम, शौर्य आदि के साथ कला प्रेमी होने की तुलना रघुवंशी काकुत्स्थ की समानता से की गई है। (रघुवंशी काकुत्स्थ भीनमाल के नागभट्ट प्रतिहार प्रथम का भतीजा था तथा उसके बाद भीनमाल का शासक हुआ।)

चौहानों के शेखावाटी के हर्षनाथ (पहाड़) के मन्दिर की वि. सं. 1030 ईस्वी 973 की विग्रहराज की प्रशस्ति में इसके पिता सिंहराज के वर्णन में लिखा है कि- इस विजयी राजा ने सेनापति होने के कारण उद्धत बने हुए तोमर नायक सलवण को तब तक कैद में रखा जब तक कि सलवण को छुड़ाने के लिये पृथ्वी पर का चक्रवर्ती रघुवंशी स्वयं उसके यहाँ नहीं आया। इस रघुवंशी चक्रवर्ती का तात्पर्य कन्नोज के प्रतिहार सम्राट से हैं।

तोमरनायकं सलवणं सैन्याधिपत्योद्धतं

यद्धे येन नरेश्वरा: प्रतिदिशं विर्ना (णर्णा) शिंता जिष्णुना।

कारावेश्मनि भूरयशृच विधृतास्तावद्धि यावद्गृहे

तन्मुक्तयर्थमुपागतो रघुकुले भू चक्रवर्ती स्वयम्॥

ओसियां के महावीर मन्दिर का लेख जो कि वि. सं.
1013 ईस्वी 956 का है तथा संस्कृत और देवनागरी लिपि में है उसमें उल्लेख किया गया है कि-

तस्या काषत्किल प्रेम्णालक्ष्मण: प्रतिहारताम्

ततो अभवत् पतिहार वंशो राम समुवः ॥6

तदूंद्भशे सबशी वशी कृत रिपुः श्री वत्स राजोऽभवत।'

अर्थात् लक्ष्मण ने प्रेमपूर्वक उनके प्रतिहारी का कार्य किया, अनन्तर श्री राम से प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हुई। उस प्रतिहार वंश में शत्रुओं को अपने वश में करने वाला श्री वत्सराज हुआ। जिसके द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों आदि की रक्षा की गई।

मंडौर के प्रतिहारों के, कन्नौज के प्रतिहार सम्राटों के, चाटसू के गहलोतों के, साम्भर के चौहान आदि के लेख प्रतिहारों को रघुवंशी सम्राट रामचन्द्र के लघुभ्राता लक्ष्णण के वंशज होना सिद्ध कर रहे हैं।

क्रमशः

लेखक : देवीसिंह मंडावा : पुस्तक प्रतिहारों का मूल इतिहास 

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