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प्रतिहार वंश की उत्पत्ति : मान्यता के आधार पर : भाग - 3

 भाग - 2 से आगे .....प्रतिहार अपने आप को अग्निवंशी मानते हैं, अग्विवंशी होने का क्या तात्पार्य है इसके विषय में मैंने पहले ही लिखा है और यहाँ फिर इसे वर्णित करता हूँ।

भारत पर राज्य करने वाले राजकुलों में चार कुल प्रतिहार, परमार, चौहान तथा (सोलंकी) चालुक्य आदि थे, जो अपने को अग्निवंशी मानते हैं। आधुनिक भारतीय व विदेशी विद्वान इस धारणा को मिथ्या मानते हैं। किन्तु इनमें से दो तीन विद्वानों को छोड़कर शेष सभी अग्निवंश की धारणा को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार भी करते हैं, इसलिये यहां अग्निवंश की उत्पत्ति की धारणा को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार भी करते हैं, इसलिये यहां अग्निवंश की उत्पत्ति के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है। इन कुलों की मान्यता है कि अग्निकुण्ड से इन कुलों के आदि पुरुष मुनि वसिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर उत्पन्न किये गये थे।

परमार कुल की वसिष्ठ के अग्निकुण्ड से उत्पन्न होने की कथा परमारों के प्राचीन से प्राचीन शिलालेखों और काव्यों में वर्तमान है। डा. दशरथ शर्मा लिखते हैं कि इसीलिये हम किसी अन्य कुल को अग्निवंशी माने या न माने परन्तु परमारों को अग्निवंशी मानने में हमें विशेष दुविधा नहीं है। इसका सबसे प्राचीन वर्णन मालवा के परमार शासक सिन्धुराज वि. सं. 1052-1067 के दरबारी कवि पदमगुप्त ने इन्हें अग्निवंशी होने का तथा आबू पर्वत पर वसिष्ठ के कुण्ड से उत्पन्न होने का लिखा है। इसी प्रकार
परमारों के वसन्तगढ़, उदयपुर, नागपुर, अथूणा, हाथल, देलवाड़ा, पटनारायण, अचलेश्वर आदि के समस्त शिलालेखों में भी आबू पर्वत पर महाबाहू ऋषि द्वारा बौद्धों से तंग आकर उन्हें अग्निवंशी से उत्पन्न करना लिखा है।

परमारों के बारे में पदमगुप्त ने ईस्वी 995 के करीब के वर्णन में इनकी उत्पत्ति आबू पर्वत पर वसिष्ठ के कुण्ड से होना माना है, जिसका भी वर्णन हमने पहले दिया है। पदमगुप्त की मान्यता यह नहीं हो सकती कि वह उसी समय रची गई हो, वह मान्यता कम से कम तीन सौ, चार सौ वर्ष पुरानी तो होगी ही। चालुक्य के वर्णन में भी ईस्वी 1085 के करीब यह मान्यता प्रचलन में आ चुकी थी कि वे ब्रह्मा की चुलू से उत्पन्न हुए। यह वर्णन यही संकेत करता है कि उस समय में चालुक्यों का देव शक्ति द्वारा उत्पन्न होना माना जाता था। इसी प्रकार चौहानों के वर्णन में भी इनकी उत्पत्ति के विषय में आबू पर्वत के अग्निकुण्ड से उत्पन्न होना इनके भाट और बडुओं की पुस्तकों में दिया गया है।

इस प्रकार इन सभी साक्ष्यों द्वारा किसी न किसी रूप में इन कुलों का विशेष शक्तियों द्वारा उत्पन्न करने की मान्यता की पुष्टि 10वीं सदी तक तो लिखित प्रमाणों से पहुँचती जाती हैं, जिसे डा. दशरथ शर्मा ने भी स्वीकारा है। अब यह प्रश्न सामने आता है कि ऐसी कोई घटना अवश्य घटित हुई थी, जिसके द्वारा कुछ कुलों को शुद्ध किया गया।

इसका तात्पर्य यह हुआ कि अग्निवंश की मान्यताओं को मिथ्या बताने वाले विद्वान ही दूसरे शब्दों में इन कुलों को अग्नि द्वारा शुद्ध करने को मान्यता देते हैं। इस प्रकार अपनी ही दलील को खण्डित करते हुए अप्रत्यक्ष रूप में अग्निवंशी की प्रचलित परम्परा को किसी न किसी रूप में ये विद्वान स्वीकार भी करते है। सिवाय ओझा, वैद्य और गांगोली के शेष विद्वान अग्निवंश की मान्यता को प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से मान रहे हैं।

अब विचारणीय प्रश्न यह शेष रहता है कि क्या अग्निवंश की धारणा सिर्फ कपोल कल्पना है या इसके पीछे कोई ऐतिहासिक घटना है? तब फिर यह अग्निवंश क्या है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने हेतु हमें भारत के प्राचीन इतिहास की खोज करनी होगी। भारत में वैदिक धर्म ब्राह्मणों के नियन्त्रण में आ गया था. और उसके विरुद्ध बद्ध ने बगावत करके अपना नया धर्म प्रारम्भ किया था। शनैः शनै: सम्पूर्ण क्षत्रिय वर्ण वैदिक धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अंगीकार करता चला गया। भारत में चारों कोनों में बौद्ध धर्म का प्रचार हो गया था। क्षत्रिय बौद्ध हो गये थे, उन्हीं के साथ वैश्य समाज के भी बौद्ध धर्म में चले जाने के कारण उनकी वैदिक क्रियाएँ व परम्पराएँ समाप्त हो गई। इस प्रकार वैदिक क्षत्रिय जो सूर्यवंशी कहलाते थे, अब उन परम्पराओं के समाप्त हो जाने से वे सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी कहलाने से रह गये क्योंकि यह मान्यतायें तो वैदिक धर्म की थी, जिसे अब वे छोड़ चुके ये और बौद्ध धर्म स्वीकार करे चुके थे जिसमें ऐसी कोई मान्यतायें नहीं थी। वैदिक परम्परायें नष्ट प्राय: हो चुकी थी और इस कारण से अप्रसन्न होकर ब्राह्मणों ने पुराणों तक में यह लिख दिया कि कलियुग के राजा सब शूद्र ही होंगे। उस युग में ब्राह्मण और शूद्र ही हिन्दू रह गये थे।



उस युग में समाज रक्षा तथा शासन संचालन का कार्य क्षत्रियों का था, किन्तु । बौद्ध हो चुके थे, इसलिये वैदिक धर्म की रक्षा का प्रश्न ब्राह्मणों के सामने बड़ा जटिल हो गया था। तब उन्होंने किसी रूप में क्षत्रियों को वापस वैदिक धर्म में लाने के प्रयास शुरू किये। उस समय ब्राह्मणों के मुखिया कहिये ऋषि कहिये उनके अथक प्रयासों से प्रारम्भ में चार क्षत्रिय कुलों को बौद्ध धर्म से वापस वैदिक धर्म में दीक्षित किया गया और आबू पर्वत पर यज्ञ करके बौद्ध धर्म से उनका वैदिक धर्म में समावेश किया गया। यही अग्निवंश का प्रारम्भ है। | छत्रपुर की प्राचीन वंशावली में भी पंवारों के आदि पुरुष को बौद्धों के उत्पात । तंग आकर ऋषियों द्वारा उत्पन्न करना माना गया है। वंश भास्कर में भी बौद्धों के उत्पात । अग्निवंश वाले कुलों को उत्पन्न करना माना है। अबूल फजल के समय तक यह तो केन्हीं प्राचीन ग्रन्थ से या प्राचीन मान्यताओं से विदित था कि ये चारों कुल बौद्ध मत वापस वैदिक धर्म में आये थे। इसी मान्यता का उल्लेख अबूल फंजल ने आइने अकबरी किया है। 

आबू पर्वत पर यज्ञ करके चार क्षत्रिय कुलों को वापस वैदिक धर्म की दीक्षा देने ग एक ऐतिहासिक कार्यक्रम था, जो करीब 6ठी या 7वीं सदी में हुआ। यह कोई कपोल' ल्पना नहीं थी और न कोई मिथ्या बात थी, अपितु वैदिक धर्म को पुन: सशक्त करने प्रथम कदम था, वह कुण्ड आज भी आबू पर्वत पर विद्यमान है, जिसकी याद के रूप बाद में ये कुल अपने आपको अग्निवंशी कहने लगे।

क्षत्रिय व वैश्यों के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद वैदिक संस्कार तो लुप्त हो गये थे, यहां तक कि वे शनै: शनै: आने गौत्र तक.को भी भूल चुके थे। जब वे वापस वैदिक धर्म में आये तब क्षत्रियों तथा वैश्यों द्वारा नये सिरे से पुरोहित बनाये गये। उन्हीं के गौत्र, उनके यजमानों के भी मान लिये गये। इसलिए समय-समय पर नये स्थान पर जाने पर जब पुरोहित बदले तो उनके साथ अनेक बार गौत्र भी बदलते चले गये। इतिहासकार वैद्य और ओझा की भी यही मान्यता है।

क्रमश : 

लेखक : देवीसिंह मंडावा : पुस्तक - प्रतिहारों का मूल इतिहास

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