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चौहान राजवंश की निरबाण शाखा का इतिहास

राजस्थान में चौहान राजवंश की प्राचीन राजधानी संभार के एक राजकुमार लक्ष्मण ने वर्तमान पाली जिले के नाडोल में अपना राज्य स्थापित किया। आगे चलकर उसकी वंश परम्परा में आसराव हुए आसराव की एक महारानी के उच्च आचरण तथा हरि भक्ति में उन्नत होने के कारण वह देवी स्वरूपा मानी गयी। उसके चार पुत्र हुए जो देवी से उत्पन्न होने के कारण देवड़ा कहलाये। यह महारानी देल्हणदेवी थी। जो पवित्र सीन सारस्वत भूमी के राजा की पुत्री थी। रानी के इन्ही चार पुत्रों में सबसे छोटे पुत्र का नाम था नरदेव।

नरदेव देवड़ा कहलाते थे। नरदेव को अपने पिता के चौथे पुत्र होने के नाते नाडोल का राज्य सिंहासन मिलने की कोई आशा नहीं थी। वैसे भी नाडोल के राज्य सिंहासन के लिये आसराज और उसके भतीजे रतनपाल में खींचतान चल रही थी। ऐसे वातावरण में नरदेव देवड़ा ने यही उचित समझा कि नाडोल राज्य से बाहर जाकर कोई नया राज्य स्थापित किया जाए। नरदेव देवड़ा ने अपने साथ कुछ घुड़सवार लिए और नई भूमी प्रप्त करने की आशा में चल पड़ा। राजस्थान की उतर पूर्व की सीमा पर खण्डेला पर कुँवरसी डाहिल राज्य कर रहा था। (हेहय वंश कलचुरी शाखा की उपशाखा डाहिल कहलाती है जिसमें प्रसिद्ध शिशुपाल श्री कृष्ण के समकालीन हो गया है।) नरदेव देवड़ा ने खण्डेला के डाहिल राजा कुंवरसी पर आक्रमण कर दिया खण्डेला के उतर की ओर उदयपुर के समीप किरोड़ी ग्राम के पास युद्ध हुआ, जिसमें नरदेव देवड़ा विजय हुए। वि. सं. 1141 में खण्डेला  पर नरदेव देवड़ा का अधिकार हो गया। नरदेव को अपने कुलदेव भगवान शंकर का इष्ट था अतः खण्डेला खण्डेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया।

उस वक्त उतर भारत में चौहानों का शक्तिशाली राज्य था शेखावाटी के खंडेला के पास संभार पर शक्तिशाली शासक विग्रहराज चौहान का शासन था। नरदेव निरबाण अपने वंशज चौहानों से घनिष्टता का फायदा उठाते हुए सांभर का विश्वसनीय सामंत बन गया और उनकी शक्ति का फायदा उठाते हुए अपने राज्य के पास अरावली घाटी की श्रंखला में उदयपुरवाटी से पूंख, बबाई, पपुरना, खरकड़ा, जसरापुर व त्योंदा तक अपने शक्तिशाली ठिकाने स्थापित कर अपना राज्य विस्तार कर छोटा सा सुदृढ़ राज्य स्थापित कर लिया।

इस प्रकार नया राज्य प्राप्त कर नरदेव अपने पिता आसपाल से आशीर्वाद लेने जब नाडोल गया तो राजा आसराज बहुत ही प्रसन्न हुए और नरदेव को ’’निर्व्वाण’’ ‘‘निरबाण’’ की उपाधि प्रदान की उस काल में निरबाण उपाधि का प्रचलन भी था। मालवा के परमार राजा नरवर्मन ने भी अपनी उपाधि या बिरूध ’’निर्बाण नारायण’’ रखी थी। उसके बाद से नरदेव देवड़ा ने देवड़ा कहलाना छोड़ दिया और नरदेव निर्व्वाण कहलाने लगे और इसी से प्रसिद्धि प्राप्त की। नरदेव के वंशज भी निरबाण ही कहलाने लगे। इस तरह चौहानों वंश में निरबाण नाम से एक मुख्य खांप का प्रादुर्भाव हुआ।

बांकीदास री ख्यांत 161 में निर्बाण के सम्बन्ध में निम्न पंक्तियां लिखि हैंः-

‘‘देवड़ो निर्बाण जिण रै वंश रा निरवाण कहावै।

कुमारसि डाहलिया कनै सूं खंडेला लियो।।’’

नोटः- सारस्वत भूमी वह भाग कहलाता था जहाँ सरस्वति नदी बहती थी। पंजाब का बहावलपुर (पाकिस्तान) सिरसा हिसार आदि का भाग उस राज्य में थे। यौद्धेय (जोइया) क्षत्रियों का राज्य सारस्वत भूमि पर था। साम्राज्ञी देल्हणदेवी इसी वंश की थी।

खण्डेला पर नरदेव निर्बाण ने वि.सं. 1141 (1084 ई.) में राज्य स्थापित किया था। उस समय साम्भर पर विग्रहराज तृतीय चौहाण का राज्य था। गुजरात में उस समय कर्ण का राज्य था। मालवा पर सम्राट उदयादित्य पंवार का राज्य था। 

अकबर काल में निरबाणों पर मुगल दरबार में उपस्थित होने हेतु निरंतर दबाव पड़ता रहा पर इन्होने न तो कभी अकबर की अधीनता स्वीकार की, न कभी उसे कर दिया, न कभी मुगल दरबार में ये नौकरी करने गये। अकबर ने इसे अपनी तौहीन समझी पर इन पर कभी मुगल सेना नहीं भेजी कारण साफ था उस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में निरबाणों की छापामार युद्ध प्रणाली के आगे इन्हें हराना बहुत कठिन था। कई बार पड़ताली मुगल दस्ते इन पर चढ़ कर गये पर उन्हें निरबाणों ने हराकर या लूटकर वापस भगा दिया।

दोहा- 

राजा रावहि रुल नम्या, नमग्या लोदि पठान।

अकबरशाह नै न नम्या, राणा और निर्बाण।।

अर्थातः अकबर के साशन काल में सभी राव, राजा और पठानों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी। परन्तु मेवाड़ के राणाओं ने और खंडेला के निर्बाणांे ने कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार नही की और न ही उसे कभी कर दिया।  आखिर रायसल शेखावत ने इन्हें हराकर पहले उदयपुर बाद में खंडेला का राज्य छीन इन्हें राज्यहीन कर दिया फिर भी ये कभी मुगल सेवा में नहीं गये।  



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