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रामप्रसाद तोमर (बिस्मिल)

 

रामप्रसाद बिस्मिल

सन 1857 की क्रांति के उपरान्त भी क्रांतिकारियों ने देश की स्वाधीनता के लिए आन्दोलन जारी रखा. ऐसे ही क्रांतिकारियों में राम प्रसाद बिस्मिल मुख्य क्रांतिकारी थे. पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नाम से जाने वाले रामप्रसाद बिस्मिल तंवर (तोमर) राजपूत थे. जिनको बिना शोध किये कई इतिहासकारों ने नाम के आगे पंडित लिखा होने की वजह से ब्राह्मण बना दिया. रामप्रसाद बिस्मिल का पूरा नाम रामप्रसाद सिंह था.

बिस्मिल के दादा नारायणसिंह तोमर का पैतृक गाँव बरबई था, जो तत्कालीन ग्वालियर राज्य में चम्बल नदी के बीहड़ों के बीच स्थित तोमरधार क्षेत्र के मुरैना जिला में था, जो वर्तमान मध्य प्रदेश में है। आजीविका हेतु नारायणसिंह ने अपनी पत्नी एवं दोनों पुत्रों मुरलीधरसिंह व कल्याणसिंह सहित अपना पैतृक गाँव छोड़ दिया। उनके गाँव छोड़ने के बाद बरबई में केवल उनके दो भाई रह गये जिनके वंशज आज भी उसी गाँव में रहते हैं।  कालान्तर में यह परिवार उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर शाहजहाँपुर आ गया। नारायणसिंह तोमर जाति के क्षत्रिय थे किन्तु उनके आचार-विचार, सत्यनिष्ठा व धार्मिक प्रवृत्ति से स्थानीय लोग प्रायः उन्हें ‘‘पण्डित जी‘‘ ही कहकर सम्बोधित करते थे। यहीं से इस परिवार की पहचान पंडित के रूप में होने लगी और परिवार के सभी सदस्यों के नाम के आगे लोग पंडित लगाने लगे जिसकी वजह से यह भ्रम फैला कि रामप्रसाद पंडित है जबकि वे तंवर (तोमर) क्षत्रिय थे।

नारायणसिंह के बड़े पुत्र मुरलीधर सिंह का विवाह आगरा जिले में जोधपुरा ग्राम में परिहारों के यहाँ हुआ था. बड़े पुत्र मुरलीधरसिंह के पहले एक पुत्र हुआ जिसकी मृत्यु हो गई. फिर दूसरा पुत्र हुआ जो कि रामप्रसादसिंह थे. रामप्रसाद के घर में सात्विक वातावरण था. दादा नारायणसिंह ईश्वर भक्त थे और माता सरल और परम्परागत उच्च संस्कारों से युक्त महिला थी. माता-पिता के संस्कारों का रामप्रसाद पर पूरा-पूरा प्रभाव पड़ा.

बड़े होने पर रामप्रसाद कांग्रेस के आन्दोलनों में भाग लेने लगे. लेकिन संभवतः कांग्रेस का दोहरा चरित्र उनके स्वाभाव के अनुकूल नहीं था और वे प्रत्यक्षत: परिणाम दिखाई पड़ने वाले रास्तों की ओर मुड़ गये. देश की आजादी के संघर्ष में उन्होंने अपने ढंग से चलते हुए क्रांतिकारी आन्दोलनों में भाग लेना आरम्भ किया. इन्हीं दिनों 13 अप्रैल 1919 को पंजाब में जलियांवाला बाग़ हत्याकाण्ड हुआ. इस घटना से रामप्रसाद अत्यधिक खिन्न हुए और उन्होंने एक शेर लिखा-

ये फ़क्त इस जुर्म से तुझको गाफिल क्या मिला.

नीम बिस्मिल छोड़ने से तुझको हासिल क्या हुआ..

इसी समय वे रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से जाने जाने लगे. ‘‘बिस्मिल‘‘ उनका उर्दू तखल्लुस (उपनाम) था जिसका हिन्दी में अर्थ होता है "आत्मिक रूप से आहत।" बिस्मिल के अतिरिक्त वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कवितायें लिखते थे। 11 वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और स्वयं ही उन्हें प्रकाशित किया। उन पुस्तकों को बेचकर जो पैसा मिला उससे उन्होंने हथियार खरीदे और उन हथियारों का उपयोग ब्रिटिश राज का विरोध करने के लिये किया। 11 पुस्तकें ही उनके जीवन काल में प्रकाशित हुईं और ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त की गयीं।

यह भी एक संयोग है कि 11 जून को जन्में रामप्रसाद ने 11 ही पुस्तकें लिखी और इन्हें लखनऊ सेण्ट्रल जेल की 11 नम्बर बैरक  में रखा गया था। इसी जेल में उनके दल के अन्य साथियोँ को एक साथ रखकर उन सभी पर ब्रिटिश राज के विरुद्ध साजिश रचने का ऐतिहासिक मुकदमा चलाया गया था।

राम प्रसाद  की अमर रचना ‘‘सरफरोशी की तमन्ना‘‘ गाते हुए न जाने कितने देशभक्त फाँसी के तख्ते पर झूल गये।

जब रामप्रसाद ने क्रांतिकारी गतिविधियाँ तेज की तो ज्यादा हथियारों की आवश्यकता हुई, जिन्हें खरीदने के लिए उनके पास धन नहीं था. उसी समय रेलगाड़ी द्वारा अंग्रेजों का खजाना जा रहा था. 9 अप्रैल सन 1925 ई. को रामप्रसादसिंह और उनके साथियों ने लखनऊ के पास काकोरी रेल्वे स्टेशन के पास सरकारी खजाने को लूट लिया. सरकारी खजाने को लूटने के अपराध में रामप्रसाद पकड़े गये. जेल में कई दफा उन्हें सरकारी गवाह बनने के लिए प्रलोभन दिए गये. परन्तु एक सच्चे क्षत्रिय के स्वभाव में सौदेबाजी और लाभ-हानि के लिए कार्य करने का कोई स्थान नहीं था. वे प्रलोभनों के सामने नहीं झुके. अत: उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई. मुकदमें में पैरवी के लिए धन का अभाव तथा तत्कालीन स्वतंत्रता सेनानियों का असहयोग आड़े आया, जिसका जिक्र रामप्रसाद ने अपनी आत्मकथा में विस्तार से किया है.

सेशन जज के फैसले के खिलाफ 18 जुलाई 1927 को चीफ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर लुइस शर्ट और विशेष न्यायाधीश मोहम्मद रजा के सामने अवध चीफ कोर्ट में अपील दायर की गयी। कोर्ट में राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी पैरवी खुद की।

बिस्मिल ने चीफ कोर्ट के सामने जब धाराप्रवाह अंग्रेजी में फैसले के खिलाफ बहस की तो सरकारी वकील बगलें झाँकते नजर आये। और बिस्मिल की इस तर्क क्षमता पर चीफ जस्टिस लुइस शर्टस को विस्मय हुआ. साथ ही उनके जवाब से चिढ़कर स्वयं वकालत करने की अर्जी खारिज कर दी। उसके बाद उन्होंने 76 पृष्ठ की तर्कपूर्ण लिखित बहस पेश की। जिसे पढ़कर जजों को कहना पड़ा कि इसे लिखने में जरुर ही किसी बहुत बुद्धिमान और योग्य व्यक्ति का हाथ है. रामप्रसाद चाहे ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन फिर भी नामी एडवोकेट पण्डित जगतनारायण जैसे सरकारी वकील की भी सुध-बुध भुला देते थे. ऐसे होनहार क्षत्रियों में हीरे रामप्रसाद को बनवारीलाल जो कांग्रेस कमेटी के मंत्री रह चुके थे और असहयोग आन्दोलन में 6 माह कारावास में भी रहे थे, के इकबाली मुजरिम होने के विश्वासघात के कारण रामप्रसादसिंह व उनके तीन और साथियों के साथ फांसी की सजा सुनाई गई. 22 अगस्त 1927 को जो फैसला सुनाया गया उसके अनुसार राम प्रसाद बिस्मिल को आई॰ पी॰ सी॰ की दफा 121 (ए) व 120 (बी) के अन्तर्गत आजीवन कारावास तथा 302 व 396 के अनुसार फाँसी का हुक्म हुआ।

19 दिसम्बर सन 1927 को फांसी की सजा से एक दिन पूर्व 18 दिसम्बर को रामप्रसाद की माता उनसे मिलने जेल में आई. अपनी माता से मिलते ही रामप्रसाद की आँखों में अश्रु बह चले. माँ बहुत हिम्मत वाली क्षत्राणी थी. जब माँ ने मना किया तो बोले- माँ ! मुझे चिंता और पछतावा नहीं है. मैं मौत से नहीं डरता. लेकिन माँ ! आग के पास रखा घी पिघल जाता है, तेरा मेरा सम्बन्ध ही कुछ ऐसा है कि पास होते ही आंसू उमड़ पड़े. नहीं तो मैं बहुत खुश हूँ. इसी ख़ुशी के साथ यह तंवर क्षत्रिय यह कहते हुए फांसी के फंदे पर झूल गया-

मैं ब्रितानी साम्राज्य के पतन की कामना करता हूँ.

है देश को स्वधीन कराना, जन्ममय संसार में.

तत्पर रहूँगा मैं सदा, अंग्रेज दल संहार में..

अन्याय का बदला चुकाना, मुख्य मेरा धर्म है.

मद दलन अत्याचारियों का, यह प्रथम शुचि कर्म है.

अंग्रेज रुधिर की धार से निज, पितृगण तर्पण करूँ.

अंग्रेज सिर सहित भक्ति में, जननी को अर्पण करूँ..

रामप्रसाद बिस्मिल

आखिर 18 दिसम्बर सन 1927 को इलाहाबाद की नैनी स्थित जेल में रामप्रसाद बिस्मिल को साथियों सहित फांसी दे दी गई और भारत माता का एक क्षत्रिय सपूत एक बार फिर भारत माँ को विदेशी चुंगल से आजाद कराने के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देते हुये चिरनिंद्रा में फिर भारत माँ की कोख में जन्म लेने की हसरत मन में पाले सो गया।

उनकी याद में ग्राम बरबाई में श्री रामप्रसाद बिस्मिल की प्रतिमा लगाई गई है.    

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