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ठाकुर रोशनसिंह

 

ठाकुर रोशनसिंह

सन 1857 ई. की क्रांति के उपरांत भी देशभर में अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ युवा क्रांतिकारी स्वराज्य के लिए लड़ाई लड़ रहे थे. इन क्रांतिकारियों में ठाकुर रोशनसिंह का नाम भी उल्लेखनीय है. क्रांतिकारी रोशनसिंह का जन्म उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जनपद में स्थित ग्राम नवादा में 22 जनवरी सन 1892 ई. को हुआ था. इनकी माता का नाम कौशल्या देवी और पिता का नाम ठाकुर जंगीसिंह था.

ठाकुर रोशनसिंह कट्टर आर्य समाजी थे फिर गेंदालाल दीक्षित के दल शिवाजी समिति के सदस्य बन गये. 9 अगस्त 1925 ई. को उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास काकोरी रेल्वे स्टेशन के पास क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों का खजाना लूट लिया था. सरकारी खजाना लूटने के अपराध में ठाकुर रोशनसिंह अपने साथियों के साथ पकड़ लिए गये. इस अपराध में इनके अन्य साथी रामप्रसाद "बिस्मिल" तोमर और असफाक उल्लाह आदि पकड़े गए थे. जो सरकारी खजाना लूटा गया था, उसमें ठाकुर रोशनसिंह शामिल नहीं थे. इसके बावजूद इन्हें 19 दिसम्बर 1927 को इलाहाबाद की नैनी जेल में फांसी पर लटका दिया था. रोशनसिंह के समवय केशव चक्रवर्ती इस डकैती में शामिल थे. केशव की शक्ल रोशनसिंह से मिलती-जुलती थी. केशव बंगाल अनुशीलन समिति का सदस्य भी था. फिर भी रोशनसिंह पकड़े गए. अंग्रेज हकूमत का मानना था कि इस डकैती में रोशनसिंह थे.

चूँकि रोशनसिंह बमरोली डकैती में शामिल थे और उनके खिलाफ पूरे सबूत भी मिल गये थे. इसलिए पुलिस ने सारी शक्ति ठाकुर रोशनसिंह को फांसी की सजा दिलवाने में लगा दी और केशव चक्रवर्ती को खोजने का कोई प्रयास ही नहीं किया. सी.आई.डी के कप्तान खानबहादुर तसद्दुक हुसैन रामप्रसाद बिस्मिल पर बार-बार यह दबाव डालते रहे कि वह किसी भी तरह से अपने दल का सम्बन्ध बंगाल की अनुशीलन समिति या रूस की बोल्शेविक पार्टी से बता दे, परन्तु बिस्मिल टस-से-मस नहीं हुए. आख़िरकार रोशनसिंह व उनके दो अन्य साथियों रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला तीनों को 19 दिसम्बर सन 1927 को फांसी की सजा दे दी गई. इस फैसले के खिलाफ उन्होंने उच्च न्यायालय और वायसराय (गवर्नर जनरल) के यहाँ अपील की, लेकिन कोई नतीजा न मिकला.

फांसी लगने से पूर्व 13 दिसम्बर सन 1927 को उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र लिखा था-

एक सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी. ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज हरगिज नहीं करे. मेरी मौत ख़ुशी का कारण होगी. दुनिया में पैदा होकर मरना जरुर है. दुनिया में बद फैली करके अपने को बदनाम न करें और मरते वक्त ईश्वर को याद रखें, यही दो बातें होनी चाहिए. ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह दोनों बातें है. इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार अफ़सोस लायक नहीं है. दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ. इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला. इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही.

मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिए जा रहा हूँ. हमारे धर्मशास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों की.

पत्र समाप्त करने के पश्चात् उसके अंत में उन्होंने अपना यह एक शेर भी लिखा-

जिन्दगी जिन्दादिली को जान ए रोशन.

वरना कितने मरे और पैदा हुए जाते हैं..

फांसी से पहले रात में ठाकुर रोशनसिंह कुछ घंटे सोये, फिर रात से ही ईश्वर भजन करते रहे. प्रात:काल शौच आदि से निवृत होकर स्नान-ध्यान किया. कुछ देर गीता पाठ किया और फिर पहरेदार से कहा चलो. पहरेदार हैरत से देखने लगा कि यह कोई आदमी है या देवता. उन्होंने काल कोठरी को प्रणाम किया और गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फांसी स्थल की ओर चल दिये. फांसी के फंदे को चूमा फिर जोर से तीन बार वंदेमातरम् का उद्घोष किया और वेद मन्त्रों का जाप करते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए.

इलाहाबाद में नैनी स्थित जेल के फाटक के सामने हजारों स्त्री-पुरुष, युवा और वृद्ध एकत्र थे. वे उनके अंतिम दर्शन के लिए आये थे. जैसे ही उनका शव जेल कर्मचारी बाहर लाये, वहां उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया- "रोशनसिंह अमर रहे."

भारी जुलुस के रूप में उनकी शव यात्रा निकली और गंगा-यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी. जहाँ पर वैदिक रीति से रोशनसिंह का अंतिम संस्कार किया गया. उन्हें मरते दम तक बस एक ही मलाल था कि उन्हें फांसी दे दी गई, कोई बात नहीं क्योंकि उन्होंने तो जिन्दगी का सारा सुख उठा लिया था. परन्तु रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला जिन्होंने जीवन का एक भी एशोआराम नहीं देखा. उन्हें इस बेरहम बरतानिया हुकूमत ने फांसी पर क्यों लटकाया?

नैनी जेल के फांसी स्थल के सामने अमर शहीद ठाकुर रोशनसिंह की आदमकद प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके अप्रतिम योगदान के कारण लगाईं गई है. वर्तमान समय में इस स्थान पर अब एक मेडिकल कालेज स्थापित है.  

 

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