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वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई झांसी

4 जून 1857 को झाँसी में क्रांति का प्रारम्भ कर महारानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के अत्याचारों से पीड़ित होकर स्वाधीनता के लिए मर्दाने वस्त्र धारण करके सेना का नेतृत्व किया. सबसे पहले 12 नम्बर पलटन के सूबेदार गुरुबक्स सिंह ने रानी के आदेश से झाँसी के मैगजीन व खजाने पर कब्ज़ा किया. 5 जून से लेकर 7 जून तक रानी की सेना व अंग्रेजी सेना के मध्य युद्ध होता रहा. 7 जून को रानी के सेना के रिसालेदार कालेखां ने झाँसी किले पर अधिकार कर स्वतंत्रता का झण्डा फहरा दिया और झाँसी से कम्पनी सरकार का शासन ख़त्म कर दिया. महारानी लक्ष्मीबाई को झाँसी की गद्दी पर दामोदर राव का संरक्षक बनाकर बैठाया गया. रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी पर लगभग 11 महीने तक शासन किया. रानी के शासनकाल में जनता सुखी और साधन संपन्न हुई.



झाँसी पर आक्रमण कर पुन: अंग्रेज सत्ता स्थापित करने के लिए सर ह्यूरोज 6 जनवरी 1858 को रायगढ़, सागर, बानापुर, चन्देरी आदि स्थानों को विजय करता हुआ 20 मार्च 1858 को झाँसी के निकट पहुंचा. झाँसी इस समय प्रदेश के क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा केंद्र था. नगर के अन्दर बानापुर का राजा मरदानसिंह तथा अनेक सरदार रानी की सहायता के लिए मौजूद थे.

रानी लक्ष्मीबाई ने सैनिक तैयारी के लिए अंग्रेज सेना पहुँचने के पूर्व ही झाँसी के चारों तरफ का इलाका वीरान करवा लिया था. ताकि शत्रु की सेना को झाँसी पर आक्रमण करते समय रसद आदि न मिल सके. खेत सूने थे, आस-पास घास तक नहीं रहने दी गई. किन्तु महाराजा सिन्धिया और टीकमगढ़ के राजा ने कम्पनी सेना के लिए रसद और घास आदि का अच्छा प्रबन्ध कर दिया था कि अंग्रेजी सेनाओं को कोई कठिनाई न हो.

रानी लक्ष्मीबाई ने हर एक मोर्चे की व्यवस्था अपने सामने करवाई, तोपें फलिस से ऊपर चढ़वाई. रानी की उत्तम व्यवस्था देखकर सर ह्यूरोज लिखता है कि- "रानी लक्ष्मीबाई के साथ झाँसी की सैकड़ों स्त्रियाँ तोपखाने और मैगजीन का काम करते देखी गई."

झाँसी का महासंग्राम- 24 मार्च 1858 को सबसे पहिले प्रात: एक तोप ने जिसका नाम धनगर्ज था, कम्पनी की सेना के ऊपर गोले बरसाने शुरू किये. इसके बाद लगातार 8 दिन तक संग्राम चलता रहा. 25 मार्च को महासंग्राम हुआ. अंग्रेजों ने सारे दिन व सारी रात तोपों से गोले बरसाये. रानी लक्ष्मीबाई के तोपचियों ने भी अंग्रेजी सेना के ऊपर गोले दागे.

26 मार्च की दोपहर कम्पनी की सेना ने नगर के दक्षिणी फाटक पर जोर से गोले बरसाकर झाँसी की तोपों को ठण्डा कर दिया. परन्तु रानी की सेना के तोपची ने अपनी तोपों के मुंह मोड़कर शत्रु की सेना पर गोले बरसाने शुरू कर दिए और अंग्रेजी सेना के सबसे अच्छे तोपची को गोले से उड़ा दिया. कुछ समय के लिए अंग्रेजों की तोपें ठण्डी हो गई. रानी लक्ष्मीबाई ने खुश होकर अपने तोपची गुलाम ग्रास खां को सोने का एक कड़ा (चुड़ा) ईनाम में दिया. पांचवें व छटे दिन 4-5 घंटे तक रानी की तोपों ने भयंकर गर्जना कर चमत्कार दिखाया. अंग्रेजी सेना के अनेक आदमी मारे गये. फिर भी अंग्रेजी सेना का उत्साह कम नहीं हुआ. सातवें दिन अंग्रेजी सेना ने झाँसी किले की बांई ओर की दिवार गिरा दी. आधी रात को 11 करोगरों ने दिवार की मरम्मत कर उसे दुरस्त कर दिया. झाँसी की तोपें फिर से सुबह काम करने लगी. आठ दिन कम्पनी की सेना ने शंकर किले पर भयंकर आक्रमण किया. किले के अन्दर पीने के पानी के मार्ग पर तोपें बरसाकर 6-7  आदमियों को मार गिराया. दक्षिणी फाटक पर तोपों द्वारा कम्पनी ने बड़ा आक्रमण किया. शंकर किले में रानी के एक बारूद खाने पर एक गोला गिरा, जिससे कारखाने के 30 मजदूर व स्त्रियाँ मारी गई. उस दिन का संग्राम भीषण था. रानी के अनेक तोपची व सैनिक मारे गए. परन्तु रानी ने अपनी सहयोगी वीरांगनाओं को तोप चलाने के लिए नियुक्त किया. रानी स्वयं युद्ध के हर मोर्चे पर पहुँच कर व्यवस्था देखती रही. किन्तु कम्पनी की विशाल सेना के सामने झाँसी की सेना अकेले अधिक दिनों तक न टिक सकी.

तांत्या टोपे से सहायता हेतु पत्र- रानी ने तांत्या टोपे को सहायता करने हेतु पत्र भेजा. इस समय तांत्या टोपे की सेना कालपी में थी. तांत्या टोपे ने चटखारी के राजा से क्रांतिकारियों की सहायता करने को कहा. चटखारी के राजा ने क्रांतिकारियों की मदद करने से इन्कार कर दिया. तांत्या टोपे ने तत्काल चटखारी पर आक्रमण कर राजा को बन्दी बना लिया. राजा की 24 तोपें व तीन लाख रूपये युद्ध क्षतिपूर्ति के वसूल कर लिए. तांत्या टोपे की सेना रानी की मदद के लिए आगे बढ़ी. तांत्या टोपे ने कम्पनी की सेना को पीछे से घेर लिया. अंग्रेजी सेना संकट में पड़ गई. आगे से रानी की सेना युद्ध कर रही थी और पीछे से तांत्या टोपे की सेना ने हमला कर दिया. अंग्रेजी सेना ने साहस से काम लिया और पीछे मुड़कर तांत्या टोपे की सेना का मुकाबला किया. तांत्या टोपे के 1500 सैनिक मारे गये व कई तोपें अंग्रेजी सेना के हाथ लग गई. तांत्या की सेना पराजित होकर पीछे कालपी की ओर लौट गई.

3 अप्रैल 1858 को अंग्रेजी सेना ने झाँसी पर अंतिम भयानक आक्रमण किया. रानी की तोपों ने अपना जलवा दिखाना जारी रखा. अंग्रेज अफसर डिक और मिचेल जान मारे गये. बोनस और फाक्स ने मारे गए अफसरों का स्थान ग्रहण किया, परन्तु रानी के सैनिकों ने उन दोनों को भी मार गिराया. किसी विश्वासघाती ने धोखा देकर दक्षिणी दरवाजे से कम्पनी सेना को नगर में प्रवेश करा दिया. सदर दरवाजे का रक्षक खुदाबक्स और सरदार गुलामग्रासखां दोनों मारे गये. रानी का किला टूट गया और झाँसी छोड़ने के लिए रानी को विवश होना पड़ा. झाँसी की सेना ने रानी को किला छोड़कर सुरक्षित निकल जाने का प्रबन्ध किया. उसी रात रानी मरदाने वेश में अपने दत्तक पुत्र दामोदरराव को पीठ पर कसकर किले की दीवार से हाथी की पीठ पर कूद पड़ी. वह अपने प्यारे सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर अपने 10 या 15 सैनिकों के साथ कालपी की ओर चल पड़ी. लेफ्टिनेंट बोकर को सूचना मिली तो वह तुरन्त अपने घुड़सवार सैनिकों के साथ रानी का पीछा करने दौड़ पड़ा. बोकर और उसके घुड़सवार सैनिक सरपट घोड़े दौड़ाते हुये रानी का पीछा करते रहे. रानी अपने घोड़े को सरपट दौड़ाती हुई पूरी रात दौड़ती रही, सुबह होते ही गांव से दूध मांगकर अपने बच्चे दामोदरराव को पिलाया. गांव वालों ने रानी और उसके साथियों को नाश्ते में दूध पिलाया. रानी अपने साथी सैनिकों के साथ घोड़ों पर सवार होकर बिना विश्राम किये चल पड़ी. हालाँकि गांव से रानी अपने सैनिकों सहित बोकर व उसके सैनिकों के आने से पहले निकल गई. फिर भी लेफ्टिनेंट बोकर व उसके सैनिकों ने रानी का पीछा किया और बोकर अपने साथियों सहित रानी के घोड़े के पास पहुँच गया. रानी व बोकर के सैनिकों में युद्ध होने लगा. रानी ने म्यान से तलवार खींचकर बोकर पर प्रहार किया, जिसे बोकर नहीं रोक सका और वह रानी के वार से घायल होकर घोड़े से नीचे गिर पड़ा. बोकर के सैनिक उसे बचाने को दौड़ पड़े. रानी अपने सैनिकों के साथ कालपी की ओर सरपट दौड़ पड़ी, वह सुबह से शाम तक घोड़ा दौड़ाती रही, रात होते ही रानी कालपी में प्रवेश कर, नाना के भतीजे राव साहब के पास पहुँच गई. झाँसी से कालपी तक 102 मील का सफ़र रानी ने बिना रुके किया. कालपी पहुँचते ही रानी का घोड़ा थककर गिर पड़ा और मर गया.

कौंच (कंच गांव) का संग्राम- रानी लक्ष्मीबाई, राव साहब, तांत्या टोपे, बानापुर के राजा, क्षेत्रीय राजा निरंजनसिंह चौहान चकरनगर, राजा रूपसिंह सेंगर भरेह, गोपालपुरा के राजा रामचंद्रराव कछवाह और क्षेत्रीय क्रांतिकारी नेता अलग-अलग अपनी सैनिक टुकड़ियों के साथ आकर एकत्रित हुये. यह सैन्य दल बहुत शक्तिशाली बन गया था, परन्तु नेतृत्व के लिए परस्पर बातचीत कर एक नेता का चयन नहीं कर सके. यही कारण क्रांति को सफल बनाने में चूक गया. नेता पद के लिए रानी लक्ष्मीबाई सबसे योग्य थी, परन्तु वह 22 वर्ष की उम्र की स्त्री थी, जिसे प्रचलित परम्पराओं के अनुसार स्वीकृत नहीं किया गया. दूसरा योग्य सेनानायक तांत्या टोपे थे जो साधारण परिवार से थे. पेशवा व स्थानीय राजा-महाराजा उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हुये. फिर भी रानी लक्ष्मीबाई कुछ सेना लेकर स्थानीय क्रांतिकारी सेना की सहायता से कालपी से 42 मील दूर कन्चगांव (वर्तमान कौंच) पहुंची. सर ह्यूरोज की सेना से भयंकर युद्ध हुआ. एक बार अंग्रेज सेना के दक्षिण भाग को पीछे हटना पड़ा. कम्पनी के तोपची अपनी तोपें छोड़कर भाग गये.

रानी लक्ष्मीबाई अपने घोड़े पर सबसे आगे थी. सर ह्यूरोज मुकबला करने के लिए आगे बढ़ा. उसकी सेना अधिक मजबूत और उत्तम हथियारों से सुसज्जित थी. कौंच में घमासान युद्ध हुआ और अंत में अंग्रेजी सेना की विजय हुई. रानी ने हिम्मत नहीं हारी वह कालपी की ओर बढ़ गई.

कालपी का संग्राम- सर ह्यूरोज ने एक बड़ी सेना तोपखाना लेकर कालपी में रानी लक्ष्मीबाई व क्रांतिकारियों की सेना पर आक्रमण किया. क्रांतिकारियों की सेना ने एक होकर अंग्रेजों की सेना से मुकाबला किया. दोनों सेनाओं के मध्य घमासान युद्ध हुआ. एक बार क्रांतिकारियों की सेना ने अंग्रेजी सेना को पीछे हटने को मजबूर कर दिया. परन्तु कम्पनी की सेना के योग्य सेनापति सर ह्यूरोज की सुझबुझ से विजय प्राप्त करने में कामयाब रही. 24 मई 1858 को कम्पनी सेना ने कालपी में प्रवेश किया. कालपी के किले में क्रांतिकारियों का 700 मन बारूद और असंख्य अस्त्र-शस्त्र कम्पनी के हाथ लगा. इस पराजय ने क्रांतिकारियों की कमर तोड़ दी. रानी लक्ष्मीबाई ने साहस के साथ कालपी छोड़कर अन्यत्र जाकर सेना का संगठन किया.

गोपालपुरा के राजा रामचंद्र कछवाह के पास रानी लक्ष्मीबाई और उनकी शेष बची सेना पहुंची. गोपालपुरा के राजा रामचंद्र कछवाह ने रानी का स्वागत किया. सेना के भोजन व घोड़ों के लिए चारे की व्यवस्था की. कालपी युद्ध में तितर-बितर हुई क्रांतिकारियों की सेना गोपालपुरा पहुँच गई. रानी के नेतृत्व में ग्वालियर पर आक्रमण करने की योजना बनाई गई. तांत्या टोपे गुप्त रूप से ग्वालियर पहुंचकर मुरार नामक छावनी के पास अपनी सेना सहित रुका. सिन्धिया को पत्र लिखकर क्रांतिकारियों की सहायता की अपील की, किन्तु सिन्धिया ने उसे स्वीकार नहीं किया. तांत्या टोपे ने सिन्धिया की सेना के अफसरों को अपनी ओर मिला लिया. इनमें अधिकतर क्षत्रिय राजपूत थे जो अंग्रेजों के अत्याचारों से खिन्न थे.

ग्वालियर पर हमला- रानी लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे, नाना के प्रतिनिधि राव साहब तथा भिण्ड, इटावा, जालौन के क्षत्रिय राजपूत राजा, जमींदार व अन्य क्रांतिकारी यौद्धा, जिनके नाम पीछे लिखे जा चुके है, सभी संगठित हो गए और इस तरह क्रांतिकारियों की एक संगठित सेना तैयार फिर हुई. 28 मई 1858 को सभी क्रांतिकारी नेता सहित ग्वालियर पहुँच गये. 29 मई व 30 मई को तैयारी करके ग्वालियर पर 31 मई को आक्रमण किया. सिन्धिया की सेना पूर्व में ही तांत्या टोपे को वचन दे चुकी थी कि वह क्रांतिकारियों का साथ देगी.

1 जून 1858 को जियाजी राव सिन्धिया अपनी सेना व तोपखाना लेकर क्रांतिकारियों की सेना का मुकाबला करने के लिए युद्ध मैदान में आ डटा. छूट-पुट लड़ाई के बाद ग्वालियर सिन्धिया की सेना क्रांतिकारियों से आकर मिल गई. रानी की तोपों के गोलों ने सिन्धिया की तोपें ठण्डी कर दी और उनका तोपखाने का अधिकारी आकर तोपों सहित रानी की सेना से मिल गया. जियाजी राव सिन्धिया और उनका मंत्री दिनकर राव भाग कर आगरा में अंग्रेजों की शरण में चले गए.

ग्वालियर की जनता ने हर्ष और उल्लास से क्रांतिकारियों का स्वागत कर विजय जुलूस निकाला. ग्वालियर की सेना ने नाना साहब के प्रतिनिधि राव साहब को पेशवा मान कर तोपों की सलामी दी. सिन्धिया का खजाना भी क्रांतिकारियों को मिल गया.

3 जून 1858 को ग्वालियर के फूलबाग मैदान में एक बड़ा दरबार लगाया गया. उसमें इलाके के सभी क्रांतिकारी नेता, सामन्त, सरदारों ने अपना अपना स्थान ग्रहण किया. क्षत्रिय राजपूत और मराठा पलटने अपनी अपनी वर्दी पहिन कर जमा हो गई. राव साहब के सिर पर कलंगी तुर्रा रखकर पेशवा घोषित किया गया. तांत्या टोपे को प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया. 20 लाख रूपये सेना में इनाम के रूप में बाँट दिए गये. ग्वालियर में ख़ुशी के माहौल में अनेक रंगारंग कार्यक्रम हुए. रानी लक्ष्मीबाई इन कार्यक्रमों से नाखुश थी और उन्होंने तांत्या टोपे व राव साहब पेशवा को सलाह दी की कि सेना का संगठन मजबूत कर अंग्रेजों से लड़ने की तैयारी की जावे. अंग्रेज शीघ्र ही सिन्धिया को लेकर ग्वालियर पर पुन: कब्ज़ा करने आ धमकेंगे. राव साहब व दूसरे नेताओं ने रानी की सलाह की अवहेलना की और उस पर ध्यान नहीं दिया.

17 जून को सर ह्यूरोज महाराजा जियाजीराव सिन्धिया को साथ लेकर ग्वालियर पर टूट पड़ा. उसने ऐलान कराया कि कम्पनी सेना महाराजा सिन्धिया को फिर से ग्वालियर की गद्दी पर बैठाने आ गई है. तांत्या टोपे मुकाबले के लिए आगे बढ़ा. थोड़ी देर संग्राम के बाद ग्वालियर की सेना में उथल-पुथल मच गई, राव साहब घबरा गये. रानी लक्ष्मीबाई ने बिखरी हुई सेना को एकत्रित कर साहस बढाया. रानी ने नगर व किले के पूर्वी फाटक की सुरक्षा का दायित्व स्वयं संभाला. 17 जून व 18 जून 1858 को अंग्रेज सेनापति सर ह्यूरोज की सेना से क्रांतिकारी सेना का भयंकर युद्ध हुआ. रानी ने सुदृढ़ व्यूह रचना की थी, जिसे 2 दिन तक घमासान युद्ध के बाद भी अंग्रेजी सेना तोड़ नहीं सकी. तब ह्यूरोज ने किले के पश्चिम द्वार से हमला किया. राव साहब व तांत्या टोपे मोर्चे को नहीं संभाल पाये. सर ह्यूरोज की सेना किले में प्रवेश कर गई. पश्चिमी मोर्चा टूटने की सूचना मिलते ही उधर सेना बढ़ने से घिर गई. एक ओर जनरल स्मिथ की सेना तथा दूसरी ओर सर ह्यूरोज की सेना ने आकर रानी को घेर लिया. रानी बड़ी वीरता से लड़ी, उसके अधिकांश सैनिक मारे गये. रानी का घोड़ा घायल होकर गिर पड़ा तब रानी को दूसरा घोड़ा बदलना पड़ा. रानी अंग्रेजी सेना का घेरा तोड़ कर युद्ध करती हुई आगे निकल गई. जनरल स्मिथ की सेना ने उसका पीछा किया. भयंकर मारकाट के साथ दिनभर घमासान युद्ध होता रहा. भिण्ड क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों ने जीवन की परवाह किये बिना आखिरी समय तक रानी का साथ दिया. शाम होते होते अँधेरा हो गया. रानी अपने 10-15 घुड़सवार सैनिकों के साथ अंग्रेजों की एक सैनिक टुकड़ी को खदेड़ते हुए नाले के पास पहुंची, घोड़ा नाला पार न कर सका और अड़ गया. अचानक एक गोली रानी की सहेली मन्दिरा के पीछे से लगी और मन्दिरा घोड़े से गिर कर शहीद हो गई. रानी ने तुरंत मुड़कर गोरे सैनिक पर वार किया, उसका सिर कटकर जमीन पर गिर पड़ा. रानी अब चारों ओर से घिर गई और अकेली रह गई, फिर भी पीछा कर रहे अंग्रेज सैनिकों का मुकाबला किया. एक अंग्रेज सैनिक ने पीछे से रानी के सिर पर तलवार से वार किया, इस वार से रानी के सिर का दाहिना भाग कटकर अलग हो गया. इतने में एक वार रानी की छाती पर हुआ. सिर और छाती से खून के फव्वारे छूटने लगे. फिर भी  रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी तलवार से दोनों अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया. रानी घोड़े से गिर गई, उसके एक वफादार सैनिक रामचंद्र राव जो उनके साथ था, रानी को उठाकर पास ही स्थित बाबा गंगादास की कुटिया में ले गया. जहाँ कुछ ही क्षणों में रानी की जीवनलीला समाप्त हो गई. रामचंद्र राव ने रानी की इच्छानुसार शत्रु से छिपाकर घास की एक छोटी सी चिता तैयार कर, रानी के पार्थिव शरीर को उस पर लिटा कर भारत माता की उस सपूत रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार कर दिया.

स्वाधीनता संग्राम के योद्धाओं में रानी लक्ष्मीबाई सबसे योग्य नेता थी. संसार के इतिहास में रानी की वीरता और बलिदान अद्वितुय है. वह स्वाधीनता संग्राम की सर्व श्रेष्ठ "अमर शहीद" इतिहास की धरोहर है. उनकी स्मृति में ग्वालियर में फूल बाग़ के पास प्रतिमा बनाई गई है जो उनकी याद दिलाकर देशभक्ति की प्रेरणा देती है. 

आयुवानसिंह स्मृति संस्थान द्वारा प्रकाशित पुस्तक  "स्वतंत्रता समर के योद्धा" लेखक - छाजुसिंह बड़नगर और भोपालसिंह भदौरिया से साभार       

 

 

 

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