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राजा शंकरशाह गौड़ : 1857 स्वतंत्रता संग्राम का योद्धा

राजा शंकरशाह गौड़ को सन 1857 की क्रांति के अमर शहीदों की अग्रिम पंक्ति में स्थान दिया जाना चाहिये. राजा शंकरशाह गढ़मण्डला के प्रसिद्ध गौड़ राज-परिवार के वंशज थे. जिनका सम्बन्ध वीरांगना रानी दुर्गावती से भी था. वह नगरांचल के पुरवा नामक स्थान पर रहते थे. राजा शंकरशाह को अपनी वंश परम्पराओं पर गर्व था. यह राज्य कभी समय बहुत विस्तृत और शक्तिशाली था. परन्तु मराठों ने इसे पराजित कर अपने अधीन कर लिया था. उसके बाद अंग्रेजों के अधिकार में चला गया. राजा शंकरशाह को अंग्रेजों द्वारा गुजारे के लिए कुछ पेन्शन दी जाती थी. क्रांति के समय राजा के पास न तो राज्य था, न धन वैभव था, किन्तु जन साधारण पर उनका गहरा प्रभाव था. अंग्रेज उनसे मित्रता करना चाहते थे, परन्तु राजा शंकरशाह देश को स्वतंत्र कराने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं का साथ देने के लिए उनके संगठन में सम्मिलित हो गये.

सन 1857 की क्रांति का शंखनाद हुआ तो राजा शंकरशाह ने जबलपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों का नेतृत्व किया. राजा शंकरशाह व उनका पुत्र रघुनाथशाह तथा क्षेत्रीय जमींदार व क्रांतिकारियों ने मिलकर अंग्रेजी राज्य की समाप्ति के लिए संघर्ष किया. राजा शंकरशाह ने 52 वीं पलटन को गुप्त नीति से स्वाधीनता संग्राम के लिए राजी कर लिया था. राजा शंकरशाह और उनके साथी मुहर्रम के दिन अंग्रेजों पर आक्रमण करना चाहते थे. किन्तु दो जागीरदार साथियों ने विश्वासघात किया, जिससे मुहर्रम के दिन अंग्रेजों पर आक्रमण नहीं कर सके. राजा शंकरशाह व क्रांतिकारियों ने गुप्त रूप से दशहरा पर्व पर अंग्रेजों के ऊपर आक्रमण करने की तैयारी की भी थी. उधर अंग्रेज लेफ्टिनेंट क्लार्क ने अपने चपरासी को फ़क़ीर के वेश में गुप्तचर बनाकर सूचना देने के लिए तैयार किया. उस फ़क़ीर वेशधारी गुप्तचर ने लेफ्टिनेंट क्लार्क को क्रांतिकारियों की सूचना लाकर दी. उसी रात 14 सितम्बर 1858 को क्लार्क ने कुछ घुड़सवार सेना व पैदल सैनिकों को लेकर राजा शंकरशाह का गांव घेर लिया. राजा शंकरशाह व उनके सभी परिवार के सदस्यों को निकलने का कोई अवसर न मिल सका. अंग्रेजी सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उनके घर की तलाशी ली गई, जिसमें उनकी क्रांतिकारियों से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त हुई.

राजा शंकरशाह व उनके परिवार के सदस्यों को बंदी बनाने के दूसरे दिन लेफ्टिनेंट क्लार्क को सूचना मिली कि क्रांतिकारी राजा व उनके परिवार के सदस्यों को बन्दीगृह से मुक्त करवाना चाहते है. इसलिए क्लार्क ने मद्रास की पलटन को हथियारबंद कर रातभर के लिए पहरे पर लगा दिया. तीसरे दिन राजा शंकरशाह और उनके परिवार के सदस्यों को कारगर से निकाल कर अंग्रेजों ने रेजीडेन्सी में रखा था, जहाँ से मुक्त कराना कठिन था. 52 वीं पलटन में रात को कुछ हलचल हुई और और गोलियां भी चली. 52 वीं पलटन के कुछ सिपाही हथियार लेकर गायब हो गये.

अगले दिन सैनिक अदालत में मुकदमें का नाटक कर राजा शंकरशाह और उनके पुत्र रघुनाथशाह को दोषी सिद्ध किया गया. राजा शंकरशाह और उनके पुत्र रघुनाथशाह को तोप से उड़ाने का आदेश न्यायालय द्वारा दिया गया. 18 सितम्बर 1858 को प्रात: 11 बजे राजा और उनके पुत्र को तोप के मुंह के सामने लाकर खड़ा कर दिया गया. राजा शंकरशाह और उनके पुत्र को तोप के मुख के सामने तोप से बाँध दिया गया. कुछ ही क्षणों की तैयारी पूरी हो गई. तोप दागने का संकेत मिलते ही तोपची ने तोप दाग दी, राजा शंकरशाह और उनके पुत्र रघुनाथशाह के शरीर के अंग टुकड़े टुकड़े होकर इधर-उधर फ़ैल गये. रेजीडेन्सी की भूमि देश प्रेमियों के रक्त से गीली हो गई. पिता व पुत्र के पार्थिव शरीर के जो भी अवशेष मिले, वह रानी को दे दिए गये. रानी ने उनका दाह संस्कार करवाया.

राजा शंकरशाह और उनके पुत्र का बलिदान व्यर्थ नहीं गया. जबलपुर की 52 वीं देशी पलटन ने विद्रोह कर दिया. उन्होंने अंग्रेज सेनाधिकारी गैगोर को मार डाला और उनके बंगले लूट लिए गये. उसके बाद 52 वीं पलटन के सैनिक देश के दूसरे भागों में क्रांतिकारियों का सहयोग करने निकल पड़े. राजा शंकरशाह और उनके पुत्र का बलिदान क्रांति की एक चिन्गारी बनकर समस्त देश में फ़ैल गई. राजा शंकरशाह की रानी ने भी अपना जीवन क्रांति को समर्पित कर दिया. आज देश की जनता देश प्रेमी शहीदों व राजा शंकरशाह, उनके पुत्र को श्रद्धा सुमन अर्पित करती है.      

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